Ghansyam Sharma / Thu, Apr 3, 2025 / Post views : 209
दंतेवाड़ा में संभागीय स्तरीय कार्यक्रम का उद्घाटन, उप मुख्यमंत्री और वनमंत्री ने की शिरकत
दंतेवाड़ा। पत्रिका लुक
राज्य सरकार ने बस्तर की समृद्ध जनजातीय कला, संस्कृति और विरासत को सहेजने, संवारने और उसे वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की है। इसी क्रम में, बस्तर पंडुम 2025 - 'बस्तर का उत्सव' का भव्य संभागीय स्तरीय कार्यक्रम दंतेवाड़ा के हाईस्कूल मैदान में आयोजित किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का उद्घाटन प्रदेश के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और वनमंत्री केदार कश्यप ने संयुक्त रूप से किया।
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नवरात्रि के इस पावन अवसर पर बस्तर की गौरवशाली संस्कृति को संरक्षित करने और उसे विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सरकार ने बस्तर पंडुम का आयोजन किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस पहल से बस्तर की अनूठी संस्कृति और परंपराओं को दुनिया भर के लोग जान सकेंगे और समझ सकेंगे। श्री शर्मा ने बस्तर की अद्भुत सांस्कृतिक परंपरा, रीति-रिवाज और स्वादिष्ट जनजातीय व्यंजनों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस पवित्र
भूमि पर जन्म लेना सौभाग्य की बात है। उन्होंने यह भी साझा किया कि इस क्षेत्र में उनका जन्म न होने के कारण वे पहले यहां की संस्कृति और व्यंजनों से वंचित रहे, लेकिन इस कार्यक्रम ने उन्हें बस्तर के सभी स्वादों का अनुभव करने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने सरकार द्वारा संचालित योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाकर लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। वनमंत्री केदार कश्यप ने बस्तर पंडुम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस उत्सव की चर्चा अब देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हो रही है। लोग बस्तर की विशिष्ट संस्कृति को गहराई से जानने के लिए उत्सुक हैं। उन्होंने बताया कि बस्तर पंडुम के माध्यम से क्षेत्र के स्थानीय व्यंजन, वेशभूषा और आभूषण जैसी विलुप्तप्राय समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। मंत्री कश्यप ने कार्यक्रम में पूरे संभाग के जिलों से आए प्रतिभागियों द्वारा लगाई गई शानदार प्रदर्शनियों की सराहना की। उन्होंने दंतेवाड़ा के फाल्गुन मंडई और बस्तर में आयोजित बस्तर दशहरा को सामाजिक समरसता का प्रतीक बताते हुए कहा कि समाज के लोग इन परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बस्तर क्षेत्र में जन्म से लेकर मृत्यु
तक विभिन्न 'पंडुम' (उत्सव) मनाए जाते हैं और इन समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का महत्वपूर्ण संदेश है। कार्यक्रम में स्थानीय विधायक चैतराम अटामी और जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुड़ामी ने भी सभा को संबोधित किया और इस पहल की सराहना की। संस्कृति विभाग के संचालक विवेक आचार्य ने कार्यक्रम की रूपरेखा और उद्देश्यों की विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम की शुरुआत में, दोनों मंत्रियों ने प्रदर्शनी में लगे जनजातीय कला स्टॉलों का दौरा किया और वहां प्रदर्शित जनजातीय संस्कृति के पारंपरिक वाद्य यंत्रों का वादन भी किया। उन्होंने स्थानीय और जनजातीय व्यंजनों का स्वाद लिया और उनकी खूब प्रशंसा की। इस अवसर पर दंतेवाड़ा के विधायक चैतराम अटामी, जिला पंचायत अध्यक्ष नंदलाल मुड़ामी, नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती पायल गुप्ता, महिला आयोग की सदस्य श्रीमती ओजस्वी मंडावी, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुंदरराज पी., संस्कृति विभाग के संचालक विवेक आचार्य, डीआईजी कमलोचन कश्यप, कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी, पुलिस अधीक्षक गौरव राय, सीईओ जयंत नाहटा सहित अन्य गणमान्य नागरिक और जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।
इस अवसर पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी भव्य आयोजन किया गया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उल्लेखनीय है कि बस्तर पंडुम 2025 में सात प्रमुख विधाओं को शामिल किया गया है, जिनमें संभाग के सभी सात जिलों के विजेताओं के बीच प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। इन विधाओं में जनजातीय नृत्य (गेड़ी, गौर-माड़िया, ककसाड़, मांदरी, हुलकीपाटा, परब), लोक गीत श्रृंखला (जनजातीय गीत-चौतपरब, लेजा, जगारगीत, धनकुल, हुलकी पाटा - रीति-रिवाज, तीज त्यौहार, विवाह पद्धति, नामकरण संस्कार आदि पर आधारित), जनजातीय नाट्य (भतरा नाट्य), जनजातीय
वाद्य यंत्रों का प्रदर्शन (धनकुल, ढोल, चिटकुल, तोड़ी, अकुम, झाब, मांदर, मृदंग, बिरिया ढोल, सारंगी, गुदुम, मोहरी, सुलुङ, मुंडाबाजा, चिकारा), जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण का प्रदर्शन (लुरकी, करधन, सुतिया, पैरी, बाहूंटा, बिछिया, ऐंठी, बन्धा, फुली, धमेल, नांगमोरी, खोचनी, मुंदरी, सुर्रा, सुता, पटा, पुतरी, नकबेसर जैसे आभूषण), जनजातीय शिल्प एवं चित्रकला का प्रदर्शन (घड़वा, माटी कला, काष्ठ, ढोकरा, लौह प्रस्तर, गोदना, भित्तीचित्र, शीशल, कौड़ी शिल्प, बांस की कंघी, गीकी (चटाई), घास के दानों की माला) और जनजातीय पेय पदार्थ एवं व्यंजन का प्रदर्शन (सल्फी, ताड़ी, छिंदरस, लांदा, कोसरा, जोन्धरा एवं मडि़या पेज, चापड़ा चटनी, सुक्सी पुड़गा, मछरी पुड़गा, मछरी झोर, आमट साग, तिखुर, बोबो इत्यादि की बनाने की विधि, स्थानीय मसाले, स्वाद, प्रकार का प्रस्तुतिकरण) शामिल थे। इन सभी विधाओं का मूल्यांकन निर्धारित मानकों के आधार पर किया गया। बस्तर पंडुम 2025 निश्चित रूप से बस्तर की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन