Ghansyam Sharma / Wed, Jun 4, 2025 / Post views : 219
30 हज़ार में 6 हज़ार थमाए, बाकी डकार गए अफसर
जांच का दायरा बढ़ेगा तो नाम बड़े निकलेंगे?
कोण्डागांव। पत्रिका लुक
राज्य सरकार की मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद कन्याओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर उनके विवाह में सहयोग देना है, लेकिन यह योजना अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। जिले के फरसगांव विकासखंड के बड़ेडोंगर गांव में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें विभागीय कर्मचारियों पर फर्जीवाड़ा कर लाभ की राशि हड़पने का आरोप लगा है।
क्या है मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, महिला एवं बाल विकास विभाग की सुपरवाइजर रामादेवी पटेल पर आरोप है कि उन्होंने एक युवती के नाम पर योजना का लाभ प्राप्त किया, जिसका विवाह सामूहिक विवाह कार्यक्रम में हुआ ही नहीं। इसके बावजूद युवती के नाम से 30,000 रुपये का चेक जारी कराया गया, जो सीधे उसके खाते में जमा हुआ।
युवती ने मीडिया को बताया कि रमा देवी पटेल ने उसे फोन कर बुलाया और खाते में आई पूरी राशि में से 24,000 रुपये स्वयं रख लिए, जबकि उसे मात्र 6,000 रुपये देकर रवाना कर दिया गया।
युवती ने कहा ₹30,000 में से ₹6,000 ही मिले
मुझे फोन कर बुलाया गया। जब मैं ₹30,000 निकालकर सुपरवाइजर के पास गई तो उन्होंने पूरे पैसे ले लिए और पहले ₹5,000 दिए। जब मैंने और पैसे मांगे तो ₹1,000 और देकर कह दिया कि अब जाओ। मुझे सिर्फ ₹6,000 मिले, बाकी उन्होंने रख लिए।
कन्याओं की योजनाओं पर ग्रहण
शासन की मंशा की आर्थिक स्थिति से कमजोर कन्याओं का
विवाह सरकारी योजनाओं से हो और उनको लाभ मिले, लेकिन जब योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिन हाथों में है वही उसका दुरुपयोग कर रहे, तो सवाल उठते हैं कि ऐसी योजनाएं ज़मीनी हकीकत में कैसे सफल होंगी? गरीब, कमजोर वर्ग की बेटियों के नाम पर यह उगाही का खेल न केवल निंदनीय है बल्कि यह योजनाओं की साख पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
क्या अकेली थी सुपरवाइजर या पूरा विभाग शामिल?
इस फर्जीवाड़े के उजागर होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है- क्या यह गड़बड़ी सिर्फ सुपरवाइजर तक सीमित है या फिर पूरा महिला एवं बाल विकास विभाग इस खेल में कहीं न कहीं शामिल है?
सामान्य प्रक्रिया के अनुसार किसी भी लाभार्थी के नाम पर चेक काटने, पास करने और राशि ट्रांसफर कराने में केवल एक सुपरवाइजर की भूमिका संभव नहीं। इसके लिए कई स्तरों पर प्रस्ताव, स्वीकृति और सत्यापन की प्रक्रिया होती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या उच्चाधिकारी भी इस खेल में शामिल हैं?
क्या यह एक सुनियोजित नेटवर्क है जो योजनाओं की राशि गरीबों तक पहुँचने से पहले ही लूट लेता है?
क्या जांच की आड़ में पूरे मामले को दबाने की कोशिश होगी?
यदि सही मायनों में पारदर्शी जांच हो तो इसमें कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं, जिनका चेहरा अब तक ईमानदारी की आड़ में छिपा हुआ है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
इस मामले पर कोंडागांव कलेक्टर ने संज्ञान लेते हुए कहा है –
"मामले की जांच करवाई जा रही है। दोषी पाए जाने पर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
क्या कहता है कानून?
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल धोखाधड़ी (IPC 420) बल्कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी होनी चाहिए।
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