Ghansyam Sharma / Thu, Aug 28, 2025 / Post views : 195
कोण्डागांव। पत्रिका लुक ( घनश्याम शर्मा)
सरकार और प्रशासन हर बार विकास की बातें करते हैं। रिपोर्टों और मंचों से यह घोषणा भी कर दी जाती है कि कोण्डागांव जिला अब नक्सलमुक्त है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नक्सलमुक्ति का मतलब सिर्फ सुरक्षा बलों की मौजूदगी और माओवादी घटनाओं में कमी है? या इसका मतलब यह भी होना चाहिए कि अब यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मूलभूत सुविधाएं हर गांव तक पहुंचें?
उहुपाल का दर्द
ग्राम उहुपाल इसका जीवंत उदाहरण है। यहां बच्चे आज भी खुले आसमान और टीन के शेड के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। बरसात में पानी टपकता है, सर्दियों में ठंडी हवाएं बच्चों को कांपने पर मजबूर करती हैं। यह स्कूल सिर्फ एक कमरे में संचालित होता है, वह भी जर्जर और टूटे-फूटे हालात में।
ना बैठने की ठीक व्यवस्था है, ना दस्तावेज़ सुरक्षित रखने की जगह। मध्यान्ह भोजन बनाने और रखने तक की सुविधा नहीं। दीवारों में जगह-जगह छेद हैं, जिनसे सांप-बिच्छू के आने का डर बना रहता है। आखिर ऐसे माहौल में शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा?
अधूरा वादा
सरकार ने कई साल पहले यहां एक छोटा स्कूल भवन जरूर बनवाया था। लेकिन माओवादियों ने उसे तोड़ दिया। 2009 से लेकर आज 2025 तक दोबारा इस भवन का निर्माण नहीं कराया गया। यह प्रशासन की गंभीर लापरवाही ही है कि 16 साल बीत जाने के बाद भी बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
शासन के दावे बनाम हकीकत
2021 में प्रशासन ने कोण्डागांव जिला को नक्सलमुक्त घोषित किया। लेकिन अगर नक्सल मुक्त क्षेत्र में भी शिक्षा के लिए बच्चों को इतनी परेशानियां झेलनी पड़ें, तो इस घोषणा का असली अर्थ ही खत्म हो जाता है। नक्सलमुक्ति सिर्फ पुलिस और सुरक्षा बलों के नजरिए से देखना अधूरा है। इसका असली मकसद तो यही होना चाहिए कि बच्चों को बेहतर भविष्य, बेहतर स्कूल और बेहतर माहौल मिले।
सवाल प्रशासन से
क्या नक्सलमुक्ति का मतलब सिर्फ हथियारों और पुलिस चौकियों तक सीमित है?
क्यों 2009 से आज तक एक जर्जर स्कूल भवन दोबारा नहीं बन पाया?
क्या प्रशासन को यह नहीं दिखता कि उहुपाल के बच्चे असुरक्षित और असुविधाजनक माहौल में पढ़ रहे हैं?
समाधान की राह
अब जरूरत है कि शासन और प्रशासन सिर्फ कागजों और मंचों पर विकास के दावे न करें, बल्कि जमीनी हकीकत पर काम करें।
1. नया भवन निर्माण: उहुपाल और आसपास के संवेदनशील गांवों में तुरंत नए स्कूल भवन बनाए जाएं।
2. सुरक्षित माहौल: स्कूल भवन की सुरक्षा के लिए पक्की दीवारें, साफ-सफाई और विषैले जीव-जंतुओं से बचाव की व्यवस्था हो।
3. मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था: बच्चों के लिए भोजन बनाने और रखने के लिए अलग कक्ष हो।
4. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय ग्रामीणों की मदद से स्कूलों की निगरानी और रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
5. जवाबदेही तय हो: शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन को समय-सीमा में सुधार का खाका बनाना होगा।
कुल मिलाकर
नक्सलमुक्त कोण्डागांव का सपना तभी पूरा होगा, जब यहां के बच्चे सुरक्षित और अच्छे माहौल में शिक्षा मूलभूत सुविधाएं प्राप्त कर पाएंगे। वरना यह कहना गलत नहीं होगा कि— “नक्सल तो हट गए, लेकिन विकास अब भी दूर है।
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