Ghansyam Sharma / Thu, Aug 14, 2025 / Post views : 179
कोण्डागांव। पत्रिका लुक
"कोण्डागांव के आदिवासी युवक रामचंद मरकाम की कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस पूरे तंत्र के कड़वे सच्च को उजागर करती है, जहाँ पीड़ित की आवाज़ वर्षों तक फाइलों की धूल में दबकर दम तोड़ देती है। यहाँ शिकायतें रजिस्टर में बंद पड़ी रहती हैं, और ‘न्याय’ का शब्द सिर्फ़ भाषणों व दस्तावेज़ों में जीवित रह जाता है, ज़मीनी हक़ीक़त में नहीं।"
कहानी की शुरुआत
29 जनवरी 2024— यह वह तारीख़ है जब रामचंद ने दं.प्र.सं. की धारा 154(3) के तहत पुलिस अधीक्षक कोण्डागांव को एक गंभीर शिकायत सौंपी। आरोप साफ़ था: थाना प्रभारी, आजाक कोण्डागांव ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत दर्ज होने योग्य अपराध में एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया।
क़ानून कहता है कि ऐसे मामलों में पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी है तुरंत एफआईआर दर्ज करना। लेकिन क़ानून किताबों में था— अमल में नहीं।
समय बीता… पर कार्रवाई नहीं
1 साल, 6 महीने और 14 दिन गुजर गए, पर एफआईआर आज तक नहीं। यह सिर्फ़ एक तारीख़ का अंतराल नहीं, यह न्याय की प्रतीक्षा में बीते अनगिनत दिन-रात हैं, जिनमें उम्मीद धीरे-धीरे बुझती चली गई।
आरटीआई— एक हथियार
रामचंद जानते थे कि यहां शिकायतों पर समय से कार्रवाई नहीं होती। इसलिए उन्होंने शुरू से ही आवेदन के साथ आरटीआई भी जोड़ दी। इतना ही नहीं, रजिस्टर्ड डाक खर्च के लिए 100 रुपये भी भेजे— ताकि शासन को अतिरिक्त आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।
यह कदम बताता है कि आदिवासी समाज के लोग भी व्यवस्था को समझते हैं, उसकी कमियों को जानते हैं, और उसी के भीतर से रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं।
जिला प्रशासन का रवैया
रामचंद ने मंगलवार को कलेक्टर कोण्डागांव को लिखित आवेदन देकर अनुरोध किया कि इस मामले की जानकारी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु तक भेजी जाए। राष्ट्रपति, जो स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं, शायद इस दर्द को बेहतर समझ सकें।
लेकिन कलेक्टर ने आवेदन सीधे राष्ट्रपति को भेजने के बजाय जनदर्शन में मौजूद पुलिस अधिकारी को थमा दिया। रामचंद का कहना है कि उन्होंने बार-बार आग्रह किया, पर उनकी बात अनसुनी कर दी गई।
प्रशासन पर सवाल
यह प्रकरण सिर्फ़ एक शिकायत या एफआईआर का मुद्दा नहीं है। यह उस प्रशासनिक संवेदनहीनता का आईना है, जहां पीड़ित की आवाज़ को सुना तो जाता है, पर आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं दिखाई जाती।
जिला मुख्यालय में बैठी कुर्सियों पर फाइलें सरकती हैं, लेकिन न्याय की डगर पर कदम बेहद धीमे पड़ जाते हैं।
अब सवाल यह है…
क्या यह आवेदन सचमुच राष्ट्रपति तक पहुंचेगा? या फिर यह भी दर्जनों अन्य आवेदनों की तरह फाइलों के बोझ तले दब जाएगा?
रामचंद की यह जद्दोजहद हमें सोचने पर मजबूर करती है— क्या सचमुच हमारी व्यवस्था में न्याय का रास्ता इतना लंबा और पेचीदा होना चाहिए कि कोई पीड़ित 1 साल 6 महीने से ज्यादा इंतज़ार करे… और फिर भी सुनवाई न हो?
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