Ghansyam Sharma / Sun, Jul 20, 2025 / Post views : 185
कोण्डागांव। पत्रिका लुक ( विशेष लेख ✍️ )
पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज एक ऐसे दौर से गुज़र रही है जहाँ न केवल बाहरी हमले इसे कमजोर कर रहे हैं, बल्कि भीतर से भी इसकी दीवारों में दरारें पड़ती जा रही हैं। यह चिंता का विषय है कि अब पत्रकार खुद एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे हैं, सार्वजनिक मंचों पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, और निजी द्वेष को पेशेवर गरिमा पर हावी होने दे रहे हैं।
हालिया उदाहरणों को देखें तो पत्रकार, जो कभी सत्ता से सवाल करने के लिए एकजुट खड़े होते थे, अब आपसी गुटबाजी, ईर्ष्या और राजनीतिक झुकाव के चलते खुद ही सवालों के घेरे में आ रहे हैं। एक पत्रकार द्वारा दूसरे पत्रकार के विरुद्ध सोशल मीडिया या व्हाट्सएप ग्रुप में की गई सार्वजनिक टिप्पणी न केवल आपसी संबंधों को तोड़ती है, बल्कि पूरी पत्रकारिता बिरादरी की साख को भी नुकसान पहुंचाती है।
सोचने वाली बात यह है कि जब हम खुद एक-दूसरे की छवि को धूमिल करेंगे, तो फिर जनता हम पर क्यों भरोसा करेगी? पत्रकार अगर पत्रकार का सम्मान नहीं करेगा, तो फिर कैसे उम्मीद की जाए कि शासन-प्रशासन या समाज उसका सम्मान करेगा?
आज जब पत्रकारों पर पहले से ही “सरकार के इशारे पर नाचने”, “पक्षपाती रिपोर्टिंग”, या “पेड न्यूज़” जैसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो ऐसे में आपसी कलह इस पेशे को और अधिक संदेहास्पद बना रही है। यह न केवल पत्रकारों की विश्वसनीयता को घटा रहा है, बल्कि आमजन को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या पत्रकारिता अब सच की लड़ाई नहीं, बल्कि ब्लैकमेलिंग, लालच, व्यक्तिगत लड़ाइयों का अखाड़ा बन गई है? इस समय ज़रूरत है आत्ममंथन की। ज़रूरत है संयम की, संवाद की और संगठनात्मक अनुशासन की।
पत्रकारिता की गरिमा बचाएं
पत्रकारिता केवल खबरें लिखने का पेशा नहीं है, यह एक ज़िम्मेदारी है — समाज को दिशा देने की, सत्ता से सवाल करने की, और सबसे बढ़कर अपने पेशे को गरिमा देने की।
अब वक्त आ गया है कि हम एक-दूसरे पर उंगली उठाने से पहले अपने भीतर झांकें।
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