Ghansyam Sharma / Fri, Oct 23, 2026 / Post views : 8
कोण्डागांव/नारायणपुर। पत्रिका लुक
पांच साल बाद घर वापसी हुई, लेकिन आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। न आधार कार्ड, न वोटर आईडी और न ही राशन कार्ड—आखिर जरूरी दस्तावेजों के बिना सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिले? यह परेशानी है नारायणपुर जिले के छोटेडोंगर तहसील अंतर्गत ग्राम तिरकानार निवासी आदिवासी ग्रामीण रातूराम सलाम की। अपनी समस्या का समाधान कराने की उम्मीद लेकर रातूराम अपने रिश्तेदार के साथ कोण्डागांव पहुंचे और समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार शैलेश शुक्ला से मुलाकात की, ताकि उनके जरूरी दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया में मदद मिल सके।।
5 साल बाद गांव लौटे रातूराम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, रातूराम सलाम पिता चमरू राम सलाम मानसिक परेशानी के कारण कई वर्ष पहले अपने घर से निकल गए थे और आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा पहुंच गए थे। वहां मदर टेरेसा संस्था के लोगों ने उन्हें अपने संरक्षण में लेकर उपचार कराया। करीब चार साल बाद स्वस्थ होने पर वे अपने गांव तिरकानार, ग्राम पंचायत सूलेंगा (धोड़ाई), तहसील छोटेडोंगर, जिला नारायणपुर वापस लौटे।
गांव लौटने के बाद रातूराम अपने भाई के साथ रह रहे हैं। लेकिन उनके सामने अब पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेज बनवाने की समस्या खड़ी हो गई है।
जन्म प्रमाण पत्र बना, लेकिन आधार और राशन कार्ड का इंतजार
बताया जा रहा है कि रातूराम सलाम के पास आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड नहीं हैं। हाल ही में उनका जन्म प्रमाण पत्र बनवाया गया है, लेकिन अन्य जरूरी दस्तावेज बनवाने के लिए उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार, वे दिव्यांगता से संबंधित परेशानी से भी जूझ रहे हैं।
ऐसे में पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में उन्हें सरकारी योजनाओं और जनकल्याणकारी सुविधाओं का लाभ लेने में कठिनाई हो सकती है। इसी समस्या के समाधान की उम्मीद में वे अपने रिश्तेदार के साथ कोण्डागांव पहुंचे और समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार शैलेश शुक्ला से मुलाकात कर सहायता की गुहार लगाई।
शासन-प्रशासन से जल्द मदद की उम्मीद
रातूराम सलाम की मांग है कि उनके आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड बनवाने की प्रक्रिया में संबंधित विभाग आवश्यक सहयोग करें, ताकि वे नियमानुसार सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर सकें और सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें।
यह मामला उन जरूरतमंद नागरिकों की समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जो जरूरी पहचान दस्तावेजों के अभाव में सरकारी सुविधाओं तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते हैं। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग रातूराम की समस्या का निराकरण करने के लिए कब पहल करते हैं।
सवाल यह है कि जब एक आदिवासी ग्रामीण अपने गांव लौट चुका है और उसका जन्म प्रमाण पत्र भी बन गया है, तो उसके अन्य जरूरी दस्तावेज बनवाने में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए प्रशासन कब आगे आएगा? रातूराम को अब शासन-प्रशासन से मदद की उम्मीद है, ताकि उन्हें भी जरूरी दस्तावेज मिल सकें और वे सामान्य जीवन जीने के साथ पात्रतानुसार सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन