Ghansyam Sharma / Wed, Oct 21, 2026 / Post views : 32
कोण्डागांव। पत्रिका लुक
दशहरे पर्व के अवसर पर पूरे देश में रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है।जिसमें हजारों क्विंटल लकड़ी, पुआल ,कागज और पटाखों से रावण दहन कर प्रदूषण फैलाया जा रहा , तब कोंडागांव जिले के फरसगांव विकासखंड के ग्राम हिर्री और भूमका के ग्रामीणों में पर्यावरण संरक्षण का अनोखा उदाहरण पेश किया । यहां रावण जलता नहीं, बल्कि मिट्टी में मिल जाता है।

इन गावों में विगत 60 वर्षों से यहां रावण के पुतले का दहन नहीं, वध किया जाता है। मिट्टी से बनी प्रतिमा की नाभि में मटकी में प्राकृतिक रंग भरकर रखा जाता है। रामलीला में तीर से वध के बाद यह रंग निकलता है, जिसे ग्रामीण तिलक के रूप में लगाते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने बताया - जीरो एमिशन दशहरा
प्रदूषण नहीं: दहन न होने से PM 2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड और धुएं का उत्सर्जन शून्य।
मिट्टी से मिट्टी में: मिट्टी की मूर्ति खेत में मिल जाती है, किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता।
भारद्वाज बैध ग्राम हिर्री के अनुसार, रावण जलाने से उसके नाभि का अमृत भी जल जाता है, इसलिए हम वध करते हैं। दहन से प्रदूषण फैलता है।" यह मान्यता अनजाने में ही जलवायु अनुकूल त्योहार का मॉडल बन गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बस्तर के इस मॉडल को पूरे देश में अपनाया जाए तो दशहरे पर होने वाले वायु प्रदूषण में 30-40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। ज्ञान के प्रतीक रावण का यह सम्मान और प्रकृति का संरक्षण - दोनों का संदेश इस परंपरा में है।
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