Ghansyam Sharma / Thu, Oct 2, 2025 / Post views : 174
योजना की चमक और खामोश हकीकत : महिलाओं का असली सशक्तिकरण
कोण्डागांव। पत्रिका लुक
बड़ेडोंगर के मां दन्तेश्वरी मंदिर प्रांगण में इस बार शारदीय नवरात्रि के दौरान स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने अपनी मेहनत से यह साबित कर दिया कि अवसर मिले तो गांव की महिलाएँ भी आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम कर सकती हैं। पूजा सामग्री और धार्मिक सामान की बिक्री से आठ दिनों में 17 से 19 हजार रुपये तक का लाभ अर्जित कर समूह की दीदियों ने परिवार और समाज दोनों के लिए नई राह दिखाई।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सरकार और प्रशासन अक्सर ऐसे समूहों और व्यक्तियों को ही आगे लाते हैं, जो उनके कहे अनुसार काम करें। ताकि रिपोर्ट और मंच से “सफलता की कहानी” सुनाई जा सके और वाहवाही बटोरी जा सके। यही कारण है कि वास्तविक संघर्ष की कहानियाँ हाशिए पर छूट जाती हैं।
मंदिर परिसर और उसके आसपास आज भी कई महिलाएँ ऐसी हैं, जो किसी योजना की छत्रछाया में नहीं आतीं। वे बिना किसी प्रचार-प्रसार, बिना सरकारी सहयोग और बिना संसाधनों के, चुपचाप अपने परिवार का भार उठाती हैं। खेत-खलिहान से लेकर छोटे-छोटे दुकान तक, हर चुनौती को झेलते हुए वे अपने दम पर जीवन को संभालती हैं। न तो उन्हें अखबार की सुर्खियाँ मिलती हैं और न ही सरकारी योजनाओं की सूची में उनका नाम दर्ज होता है। 
असल सशक्तिकरण वहीं दिखता है, जहाँ महिला बिना मंच और ताली के भी जुझारूपन से आगे बढ़ती है। बड़ेडोंगर की इन खामोश नायिकाओं का संघर्ष शायद उतना चमकदार नहीं जितना किसी “मॉडल प्रोजेक्ट” की सफलता कहानी, लेकिन उनकी मेहनत और साहस ही समाज की असली रीढ़ है।
सरकारी योजनाएँ निश्चित रूप से सहारा देती हैं, परंतु जब चयन “कितना कहा मानेंगे” पर आधारित हो, तो असली तस्वीर अधूरी रह जाती है। और यही सबसे बड़ा सवाल है—क्या सशक्तिकरण का पैमाना केवल योजनाओं की सफलता की रिपोर्ट है, या उन चुपचाप संघर्ष करती महिलाओं का जज़्बा भी, जिन्हें किसी रिपोर्ट में जगह नहीं मिलती? ऐसी महिलाओं व उनके जज़्बे और धैर्य को सलाम हैं ।
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