Ghansyam Sharma / Fri, Apr 1, 2022 / Post views : 158
कोंडागांव पत्रिका लुक।
देसी शराब के नाम से बदनाम महुआ औषधिय गुणों की खान है। पर बस्तर के जनजातिय समुदाय इस महुआ का उपयोग देसी शराब बनाने में ज्यादा करते हैं। वनांचल में निवासरत वनवासी और वनोपज महुआ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जनजातिय समुदाय में जन्म से लेकर मृत्यु तक महुआ वृक्ष के फल फूल व पत्तियों का विशेष महत्व होता है,महुआ के बिना समाज की शादी विवाह जैसी कई परंपराएं अधूरी होती है। हाल के दिनों बस्तर के वनांचल में महुए के पेड फूलों से लदे हुए हैं ।

वनांचल महुआ फूलो की सौंधी खुशबू से महक रहा है। महुआ फूल संग्रहण के लिए ग्रामीण अल सुबह ही जंगलों की ओर रुख कर रहे हैं। ताकि अधिक से अधिक मात्रा में पेड़ से गिरते महुआ फूल संग्रहित कर सकें । ग्रामीण के एक-एक फूलों को संग्रहित कर घर के आंगन में लाकर सप्ताह भर तक अच्छी तरह सूखाते हैं। और अपनी आवश्यकता के अनुरूप बेचकर आर्थिक आय प्राप्त करते हैं।सदियों से वनांचल के लोगों के लिए महुआ फूल एक अतिरिक्त आमदनी का जरिया है। महुआ के पेड़ से लेकर फूल, छाल व पत्ते तक सभी उपयोगी है। अलग-अलग बीमारियों के अनुरूप जनजाति समुदाय महुआ को औषधि के रूप में उपयोग करता है।

महुआ संग्रहण में जुटे खुटडोबरा निवासी श्रीमती दुबत्ती बाई,संतोष , पुरन नेताम आदि के मुताबिक
महुआ पेड़ उनके लिए वरदान की तरह है। महुआ के लकडी, पत्ते, फूल, फल सबका उपयोग होता है। उन्होंने बताया कि सीजन में 8 से 10 बोरा तक महुआ एकत्र कर लेते हैं, बजार में नया महुआ 28से 30 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा ,आधे महुआ को समय-समय पर बेचकर बाजार , मेला खर्च सोना चांदी खरीदने आदि में काम आता है हैं।आधे को घर में सुरक्षित रखते हैं जिसका देवी-देवताओं को अर्पित करने तीज त्यौहार घर में मेहमान आदि के लिए शराब बनाने में उपयोग होता है।

आयुष चिकित्सक कोंडागांव डॉक्टर चंद्रभान वर्मा के मुताबिक महुआ के बीज में बड़ी मात्रा में पाया जाने वाला तेल प्रोटीन से भरपूर होता है। महुआ के बीज से मिलने वाले फैट में औषधीय गुण होते हैं। इसके तेल से त्वचा रोगों और शरीर के दर्द में मालिश सहित त्वचा रोग, गठिया, सिरदर्द, रेचक और बवासीर में भी लाभकारी है।
डॉ.चंद्रभान वर्मा आयुष चिकित्सक कोंडागांव
महुआ के एंटी-माइक्रोबियल गुण इंफेक्शन से निजात दिलाने में सहायक है। आंत से जुड़ी बीमारियों और डायरिया में इसके पेड़ की छाल से तैयार काढ़ा आराम पहुंचाता है। मसूड़ों में हल्की सूजन और खून आने पर महुआ की छाल के अर्क व छाल के अर्क के साथ गरारे करना टॉन्सिलिटिस में भी कारगर है। डायरिया में छाल का सत्व आराम पहुंचाता है। पेड की छाल में पाया जाने वाला टैनिन नामक कैमिकल घाव सुखाने में मदद करता है।
लेखनी G.S. Sharma
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