Ghansyam Sharma / Tue, Oct 14, 2025 / Post views : 251
कोण्डागांव। पत्रिका लुक
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से एक अत्यंत गंभीर मामला सामने आया है। कोण्डागांव जिले के निवासी आदिवासी युवक रामचंद मरकाम ने राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू को एक भावनात्मक पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है। पत्र में रामचंद ने प्रशासन और पुलिस पर आदिवासी उत्पीड़न के मामलों में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है और लिखा है कि यदि न्याय न मिले तो क्या वह आत्महत्या कर ले या उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ हिंसक कदम उठाए — इस विषय में राष्ट्रपति से सीधी सलाह चाहता है।
एफआईआर दर्ज न होने पर गहराई निराशा
रामचंद ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि उसने लगभग एक वर्ष आठ माह पहले आजाक (अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण) थाना कोण्डागांव में आदिवासी उत्पीड़न के आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए आवेदन दिया था।
लेकिन आज तक न तो एफआईआर दर्ज हुई, न ही किसी स्तर पर कार्रवाई हुई। उसने यह भी लिखा है कि इसी मामले में उसने पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर, मुख्यमंत्री और राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग तक शिकायत पहुंचाई, लेकिन परिणाम शून्य रहा।
गैर-आदिवासियों की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई
रामचंद ने अपने पत्र में यह गंभीर आरोप लगाया कि “गैर-आदिवासियों की शिकायत पर पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज कर लेती है और आदिवासियों को जेल भेज देती है, जबकि आदिवासी उत्पीड़न के मामलों में महीनों या सालों तक कोई कार्रवाई नहीं होती।
उसका कहना है कि इस तरह के दोहरे व्यवहार से न केवल उसका बल्कि पूरे आदिवासी समाज का संविधान पर से विश्वास डगमगाने लगा है।
‘प्रशासन में बैठे कुछ अधिकारी संविधान से परे कार्य कर रहे’
युवक ने अपने आवेदन में कहा कि जिले के पुलिस और राजस्व प्रशासन में पदस्थ कुछ गैर-आदिवासी अधिकारी, और उनके साथ जुड़े कुछ स्थानीय आदिवासी लोकसेवक, संविधान की भावना के विपरीत कार्य कर रहे हैं।
उसने लिखा कि “मेरे द्वारा प्रस्तुत ठोस साक्ष्यों और प्रमाणों को अनदेखा कर अधिकारी स्वयं विवेचक, स्वयं न्यायाधीश बनकर मामले को ‘असत्य’ घोषित कर देते हैं।
मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना का दावा
रामचंद का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम से वह मानसिक रूप से गहरे आघात में है।
उसने लिखा है —मैं एक सीधा-सादा आदिवासी युवक हूं। प्रशासन की अनदेखी और भेदभाव से मेरा मनोबल टूट चुका है। मुझे ऐसा लग रहा है कि इस देश में न्याय के लिए अब या तो मरना पड़ेगा या हथियार उठाना पड़ेगा।
हालांकि, उसने साफ तौर पर कहा है कि वह किसी असंवैधानिक कदम की ओर नहीं जा रहा और राष्ट्रपति के जवाब की प्रतीक्षा करेगा।
‘महामहिम से सीधा मार्गदर्शन चाहता हूं’
पत्र के अंत में रामचंद ने लिखा —
मैं महामहिम राष्ट्रपति से यह मार्गदर्शन चाहता हूं कि जब न्याय के सभी दरवाजे बंद हो गए हैं, तो क्या मैं अपने परिवार सहित आत्महत्या कर लूं या उन लोगों के खिलाफ हत्या का कदम उठाऊं जो हमें लगातार अपमानित और प्रताड़ित कर रहे हैं?
उसने जिला कलेक्टर कोण्डागांव के माध्यम से यह पत्र राष्ट्रपति को भेजा है और कहा है कि जब तक राष्ट्रपति से कोई जवाब नहीं मिलता, वह कोई असंवैधानिक कदम नहीं उठाएगा।
संविधान और न्याय व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की व्यथा है, बल्कि यह आदिवासी समुदाय के प्रति प्रशासनिक संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़े करता है।
यदि सचमुच किसी नागरिक को इस हद तक निराशा हो जाए कि वह देश के राष्ट्रपति से आत्महत्या या हिंसा में से किसी एक का विकल्प पूछे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गहरी चेतावनी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन