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: अनोखी परंपरा: रावण दहन नहीं, ‘अमृत तिलक’ की परंपरा...

Ghansyam Sharma / Thu, Oct 2, 2025 / Post views : 199

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कोंडागांव के भूमका और हिर्री गांव में दशहरा पर्व की अनोखी धरोहर

कोण्डागांव। पत्रिका लुक


देशभर में दशहरे पर रावण दहन की गूंज होती है, पर छत्तीसगढ़ के कोण्डागांव जिले के अंतर्गत आने वाला ग्राम पंचायत भूमका और हिर्री इस परंपरा से अलग अपनी अनोखी पहचान रखते हैं। यहां दशहरे के दिन रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि मिट्टी से बनी प्रतिमा का वध कर उसकी नाभि से निकले अमृत का तिलक किया जाता है।

दशकों पुरानी मान्यता

यह परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि चार दशक से भी अधिक पुरानी है। ग्रामीण बताते हैं कि पुरखों से सुना है कि रावण की नाभि में अमृत था, जिस कारण उसे पराजित करना आसान नहीं था। श्रीराम ने उसकी नाभि में तीर मारकर उसका वध किया। इसी प्रसंग को जीवित रखने के लिए आज भी ग्रामीण रावण का वध करते हैं और ‘अमृत’ से तिलक कर विजय की कामना करते हैं।

ग्रामीणों की श्रद्धा और विश्वास

ग्राम हिर्री के बुजुर्ग लखेश्वर, सुकमन मरकाम सरपंच कहते हैं,
“रावण का दहन करने से नाभि का अमृत भी नष्ट हो जाता है। हमारे गांव में यह मान्यता है कि अमृत से तिलक करने से मन, मस्तिष्क और शरीर को बल मिलता है। इसलिए हम रावण का वध करते हैं।”

वहीं दोनों गांव की शतीश कुमार कुवंर भूमका, बैजनाथ तिवारी, सिंग निषाद,,राम भरोष कुँव, सोम सिंग, फूल सिंग बैध का कहना है, “इस अमृत से तिलक करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। हर साल गांव की महिलाएं और बच्चे बड़ी उत्सुकता से इस पल का इंतजार करते हैं।”

प्रदूषण से भी बचाव

युवाओं का मत है कि रावण दहन से धुआं और प्रदूषण फैलता है। संजय कश्यप कहते हैं, “आज के समय में जब पर्यावरण की चिंता बढ़ रही है, हमारी परंपरा प्रदूषण से भी बचाती है। यही हमारी खास पहचान है।”

रामलीला और उत्सव का संगम

दशहरे की रात को दोनों गांवों में रामलीला का मंचन होता है। राम-रावण युद्ध का दृश्य जीवंत किया जाता है। उसके बाद मिट्टी से बने रावण का वध किया जाता है। वध के क्षण में माहौल गूंज उठता है, ढोल-नगाड़ों की थाप बजती है और ग्रामीण ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष के बीच अमृत तिलक के लिए उमड़ पड़ते हैं।

परंपरा देखने उमड़ते लोग

यह परंपरा अब सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रही। आसपास के गांवों के लोग भी इसे देखने आते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हर साल यहां जनसैलाब उमड़ता है, क्योंकि यह परंपरा लोगों को आकर्षित करती है।

सांस्कृतिक धरोहर

जानकारों का मानना है कि यह परंपरा आदिवासी संस्कृति और रामकथा का एक अनूठा संगम है। यह संदेश देती है कि बुराई का नाश तो होना ही है, लेकिन प्रकृति के कल्याणकारी तत्व (अमृत) को बचाना भी उतना ही जरूरी है।

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