Ghansyam Sharma / Sat, Sep 12, 2026 / Post views : 81
केशकाल। पत्रिका लुक (नरेंद्र सेठिया)
बस्तर की अनूठी आदिवासी परंपरा और आस्था का प्रतीक प्रसिद्ध भंगाराम देवी जात्रा शनिवार, 12 सितंबर को केशकाल में आयोजित हुई। जात्रा के दौरान भंगाराम देवी की पारंपरिक अदालत लगी, जिसमें नौ परगना क्षेत्र के देवी-देवताओं की पेशी हुई। इस बार दरबार में 35 देवी-देवताओं को पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार सजा सुनाई गई। इस अनूठी परंपरा को देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
लोकमान्यता के अनुसार भंगाराम माई को इस पारंपरिक अदालत में न्यायाधीश का स्थान प्राप्त है। ग्रामीण अपने गांव में बीमारी, विपत्ति, आपदा या पूजा-अर्चना के बाद भी समस्या दूर नहीं होने की शिकायत लेकर यहां पहुंचते हैं। परंपरा के अनुसार देवी-देवताओं को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है। उनके प्रतिनिधि के रूप में पुजारी, गायता, सिरहा, मांझी और मुखिया मौजूद रहते हैं।
लोकपरंपरा के अनुसार सुनवाई के बाद दोषी माने जाने वाले देवी-देवताओं को दंड दिया जाता है। इनमें निलंबन अथवा मान्यता समाप्त करने जैसे निर्णय भी शामिल माने जाते हैं। इस वर्ष 35 देवी-देवताओं को सजा सुनाए जाने से भंगाराम दरबार की पारंपरिक व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में रही।
परंपरा के अनुसार करीब 55 राजस्व गांवों के देवी-देवताओं के प्रतीक लाठ, आंगा, छत्र और डोली आदि के रूप में भंगाराम देवी मंदिर लाए गए। पेशी से पहले इन प्रतीकों को थाने ले जाकर हाजिरी लगाई गई। इसके बाद पुलिस सुरक्षा के बीच उन्हें मंदिर परिसर तक पहुंचाया गया।
जात्रा में ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश सहित अन्य क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचे। स्थानीय मान्यता के अनुसार भंगाराम देवी की मुख्य धार्मिक प्रक्रिया में महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है।
जात्रा से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में डॉक्टर खानदेव का भी विशेष उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि महामारी के दौर में उन्होंने क्षेत्र के आदिवासी लोगों का उपचार कर उनकी मदद की थी। उनकी सेवा से प्रभावित होकर स्थानीय लोगों ने उन्हें देवतुल्य सम्मान दिया।
देवी समिति के अनुसार इस वर्ष नौ परगना क्षेत्र के देवी-देवताओं की सहभागिता रही और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर इस अनूठी लोकपरंपरा और आस्था का हिस्सा बने।
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