Ghansyam Sharma / Sun, Sep 13, 2026 / Post views : 139
बस्तर। पत्रिका लुक
तीजा तिहार को लेकर बस्तर की लोकपरंपराओं में अपनी अलग पहचान रखने वाली तीजा जगार की परंपरा ग्राम पंचायत मधोता-02 के आश्रित ग्राम खैरगुड़ा में निभाई जा रही है। धाकड़ समाज की इस पारंपरिक धार्मिक परंपरा में विशेष रूप से नवविवाहित दंपति के सुखी दांपत्य जीवन, पारिवारिक सुख-समृद्धि और मंगलकामना को केंद्र में रखते हुए तीज व्रत की उपासना की जाती है। पांच से सात दिनों तक चलने वाले इस जगार में महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं और रातभर जागकर महादेव-बालीगौरा की कथा तथा पारंपरिक जगार गीतों के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान करती हैं।
खैरगुड़ा में तीजा जगार की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान से पूजा स्थल तैयार करने के साथ होती है। बांस की कमचियों से फुलेरा तैयार कर उसे नए कपड़े अथवा साड़ी से सजाया जाता है। पूजा स्थल पर चावल, आटा और हल्दी से मांडना तैयार कर पीढ़ा रखा जाता है, जिस पर बालीगौरा वाला परात स्थापित किया जाता है। इसके बाद गौरी-गणपति की पूजा के साथ भगवान महादेव और माता पार्वती की आराधना की जाती है। भगवान शंकर को बेलपत्र और कनेर के फूल तथा माता पार्वती को मदार के फूल और श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है।
इस जगार का विशेष महत्व नवविवाहित दंपतियों से जुड़ा हुआ है। तीज व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और पति की मंगलकामना के लिए आराधना करती हैं। परिवार में नई-नई वैवाहिक जिंदगी की शुरुआत करने वाले दंपति को इस परंपरा से जोड़ते हुए उन्हें तीज व्रत की धार्मिक और सांस्कृतिक भावना से परिचित कराया जाता है। पहली बार तीज व्रत रखने वाली नवविवाहिता की भागीदारी को भी इस परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है।
जगार के दौरान मिट्टी के मटके के ऊपर सूपा और उसके ऊपर तीर रखकर पारंपरिक धनकुल तैयार किया जाता है। बांस की झिरनी काड़ी से धनकुल बजते ही वातावरण में अलग तरह की धार्मिक लय गूंज उठती है। इसी लय पर गुरुमायें और सहायक महिलाएं महादेव-बालीगौरा की कथा, लोकगीत और देवी-देवताओं से जुड़े प्रसंगों का गायन करती हैं। स्थानीय परंपरा में देवी-देवताओं के भजन को ‘चाखना’ कहा जाता है। मान्यता है कि चाखना और जगार गीतों के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है।
तीजा जगार में महिलाओं की सामूहिक भागीदारी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। महिलाएं रातभर जागकर अखंड ज्योत की रक्षा करती हैं। आरती के बाद भजन-कीर्तन और जगार गीतों का क्रम चलता रहता है। परंपरा के अनुसार व्रत रखने वाली महिला, विशेषकर नवविवाहिता, सिर पर बालीगौरा लेकर पूजा स्थल तक पहुंचती है। दीपयुक्त कलश धारण कर पूजा में शामिल होने की परंपरा भी निभाई जाती है।
जगार के अंतिम चरण में परात में रखी बालू को दो भागों में बांटकर शिव और पार्वती के प्रतीक बनाए जाते हैं। फूल, अक्षत, धूप, दीप और फल अर्पित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। पांच से सात दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक क्रम का समापन अंतिम पूजा और आरती के साथ होता है।
ग्राम मधोता-02 खैरगुड़ा की गुरुमाय गोमती ठाकुर एवं मंदना ठाकुर तथा सहायक गुरुमाय पद्मनी ठाकुर ने बताया कि धाकड़ समाज में तीजा जगार लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। इसका उद्देश्य केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि नवविवाहित दंपतियों के सुखी दांपत्य जीवन की कामना के साथ परिवार और समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। गुरुमायों द्वारा पारंपरिक गीतों और कथाओं के माध्यम से महिलाओं को तीज व्रत की मान्यताओं से जोड़ा जाता है।
खैरगुड़ा में चल रहा यह तीजा जगार इस बात की मिसाल है कि बस्तर की लोकपरंपराएं आज भी आधुनिक दौर में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। नवविवाहित दंपति के सुखी वैवाहिक जीवन की कामना, महिलाओं की सामूहिक आस्था, महादेव-बालीगौरा की आराधना और धनकुल की थाप के बीच पांच से सात दिनों तक चलने वाला यह जगार धाकड़ समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
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