Ghansyam Sharma / Mon, Sep 14, 2026 / Post views : 92
कोण्डागांव/नबरंगपुर। पत्रिका लुक
आदिवासी समाज की पहचान केवल उसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों में नहीं, बल्कि उन हाथों की रचनात्मकता में भी दिखाई देती है, जो पीढ़ियों से प्रकृति, लोकजीवन और सामुदायिक स्मृतियों को कला और कारीगरी के रूप में सहेजते आए हैं। इसी सांस्कृतिक विरासत को शोध और दस्तावेज के रूप में सामने लाने वाली पुस्तक ‘आदिवासी कला और कारीगरी’ का रविवार को नबरंगपुर में विमोचन हुआ।
गोपबंधु बिसोई स्मृति संसद के तत्वावधान में पक्षीघर प्रकाशनी, भुवनेश्वर द्वारा प्रकाशित लेखिका एवं शोधकर्ता प्रभाती बिसोई की यह पुस्तक आदिवासी कला और शिल्प को केवल सौंदर्य की दृष्टि से नहीं देखती, बल्कि उसके पीछे मौजूद जीवन पद्धति, लोकज्ञान, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को समझने का प्रयास करती है।
होटल रॉकीसान प्रीमियम में आयोजित विमोचन समारोह में नबरंगपुर विधायक एवं जिला योजना बोर्ड अध्यक्ष गौरीशंकर माझी ने पुस्तक का विमोचन किया। डाबुगांव विधायक मनोहर रंधारी, पूर्व सांसद परशुराम माझी और कोण्डागांव के चित्रकार एवं साहित्यकार खेम वैष्णव सहित साहित्य, कला और शोध क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहे।
पुस्तक की समीक्षा शोधकर्ता एवं देशिया कुटुम के अध्यक्ष साइमन बिड़िका ने की। उन्होंने आदिवासी कला को केवल बाजार में बिकने वाले उत्पाद के रूप में देखने के बजाय उसके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार एवं ओडिशा साहित्य अकादमी की पूर्व सदस्य जेमामणि बिसोई ने की। उन्होंने आदिवासी कला, परंपरा और लोकज्ञान के संरक्षण तथा व्यवस्थित दस्तावेजीकरण को समय की जरूरत बताया।
आदिवासी समुदायों में कई पारंपरिक कलाएं किसी औपचारिक पाठशाला से नहीं, बल्कि परिवार और समुदाय के भीतर व्यवहारिक प्रशिक्षण से आगे बढ़ती रही हैं। बांस, लकड़ी, मिट्टी, धातु, कपड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी कारीगरी में स्थानीय पर्यावरण, उपयोगिता और सांस्कृतिक प्रतीकों का मेल दिखाई देता है।
लेकिन बदलती जीवनशैली, बाजार व्यवस्था और नई पीढ़ी के बदलते रोजगार विकल्पों के बीच ऐसी अनेक पारंपरिक विधाओं के सामने संरक्षण की चुनौती भी है। यही वजह है कि शोधपरक पुस्तकों का महत्व बढ़ जाता है। दस्तावेजीकरण केवल अतीत को सुरक्षित करने का माध्यम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का जरिया भी बन सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि ‘आदिवासी कला और कारीगरी’ को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पुस्तक आदिवासी समाज की रचनात्मकता के साथ उसके लोकज्ञान और सांस्कृतिक स्मृति को समझने का प्रयास है।
कार्यक्रम में सव्यसाची बिसोई ने स्वागत भाषण दिया। संचालन इंजीनियर चंदना मल्लिक ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर स्वरूपानंद बिसोई ने किया। समारोह में साहित्यकार, शोधकर्ता, कलाकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता और संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।
इस विमोचन के बहाने एक बड़ा सवाल भी सामने आता है—जो कला पीढ़ियों से समुदायों की पहचान रही है, क्या उसे केवल संग्रहालयों और पुस्तकों में सुरक्षित रखना पर्याप्त है, या उसके जीवित कलाकारों और कारीगरों को भी संरक्षण, बाजार और सम्मान देना उतना ही जरूरी है?
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